Saturday, 2 May 2015

Delhi Poetry Circle 26th April Kavya Goshthi Report

बहुभाषीय साहित्यिक संस्था “दिल्ली पोयट्री सर्कल” ने गत रविवार, दिनांक २६ अप्रेल, को सेक्टर-६ द्वारका (दिल्ली) में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया| इस गोष्ठी में दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद इत्यादि के अतिरिक्त देश के अन्य कई क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित कवियों ने भाग लिया और इस प्रकार इस गोष्ठी का स्वरुप अखिल भारतीय बन गया| चार घंटे तक सुचारु रूप से चली इस गोष्ठी में ४१ कवि उपस्थित थे और लगभग सभी कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया| सभी रचनाएँ स्तरीय और मनभावन थीं| संस्था के मुख्य संरक्षक और वरिष्ठ साहित्यकार अशोक लव ने काव्य-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहा “दिल्ली पोयट्री सर्कल द्वारा विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों को मंच प्रदान करने का हमारा उद्देश्य अवश्य पूरा होगा जैसा कि आज अन्यान्य भारतीय भाषाओं के कवियों ने कविता-पाठ कर इसे प्रमाणित कर दिया है| यह गोष्ठी सर्वभाषा समभाव को प्रकट करती है|”
गोष्ठी के आरम्भ में नेपाल व उत्तरी भारत में आए भूकम्प में जीवन खोने वाले लोगों को श्रद्धांजली अर्पित की गई| प्रोफेसर सुधेश और कमर बदरपुरी सहित अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों के सानिध्य में संस्था के पदाधिकारियों अशोक लव, प्रेम बिहारी मिश्र, वीरेन्द्र कुमार मंसोत्रा और ताराचंद शर्मा ‘नादान’ द्वारा ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के पश्चात, प्रतिभाशाली युवा कवि मनीष ‘मधुकर’ ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की और गोष्ठी का आरम्भ उनकी इस प्रभावशाली ग़ज़ल से हुआ –
“भुला देता हूँ हर ग़म को मैं कोई ग़म नहीं रखता
कि दिल है आइने जैसा मैं पेचो ख़म नहीं रखता”
तत्पश्चात, अन्य कवियों ने एक एक कर के अपनी रचनाओं का पाठ किया और गोष्ठी निरंतर ऊँचाइयों को छूती चली गई| सम्पूर्ण कार्यक्रम में विभिन्न विधाओं की कविताओं का अपना ही रंग था|
प्रेम बिहारी मिश्र की इन पंक्तियों को श्रोताओं ने खूब सराहा –
“प्रेम शमा है, प्रेम पतंगा, प्रेम रिंद है, साक़ी प्रेम
यहाँ प्रेम की पूजा होती, पग-पग प्रेम तराना है”
वीरेन्द्र कुमार मंसोत्रा की डोगरी कविता की अपनी छटा थी तो टी.एस. माटा की कविता ने पंजाबी रंग में रँग दिया| मनोहर लाल लूथरा ने भूकम्प की विभीषिका और किसानों की दुर्दशा का मार्मिक वर्णन अपनी अंग्रेज़ी कविताओं में किया वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि अशोक लव ने गोष्ठी की धारा को अपने दार्शनिक दोहों से परिवर्तित कर दिया –
“और और की चाह में, गठरी भरता जाए
इतनी गठरी बाँध ली, उठा नहीं अब पाए |
सुन्दर जग इतना बना, अटक अटक मन जाए
जिसने भेजा था यहाँ, उसे दिया बिसराय |”
चन्द्रकान्ता सिवाल ने भी कुछ ऐसे ही भाव की रचना पढ़ी –
“हर इक पग पर मेले है, फिर भी लोग अकेले हैं
मिट्टी में मिल जाएंगे, सब मिट्टी के ढेले हैं”
कवियत्री नीना ‘सहर’ ने तेज़ी से बदलते समय को इस प्रकार अभिव्यक्त किया –
“और क्या अब लिखें कहानी भी
वक़्त भी जा चुका, जवानी भी |”
आकाशवाणी के निवर्तमान सुपरिचित समाचार वक्ता श्री राजेन्द्र चुघ की लम्बी कविता ‘ख़याल’ ने श्रोताओं को बाँधे रखा| सत्य प्रकाश भारद्वाज (सिरसा), संतोष बंसल, शोभना मित्तल, सूक्ष्मलता महाजन, डॉ.भावना शुक्ल की कविताओं के साथ अनिल वर्मा ‘मीत’ की ये पंक्तियाँ बहुत सराही गईं –
“रात आती है मगर उसका पता चलता नहीं,
ग़र्दिशे-तक़दीर के मारों से घबराती है नींद |”
प्रोफेसर एस. पी. सुधेश ने प्रेम को इस तरह व्यक्त किया–
“कभी उनसे मुलाक़ात होती है
आँख से आँख की बात होती है|”
जाने माने शायर कमर ‘बदरपुरी’, हबीब शैफी, मोहम्मद सरफ़राज़ अहमद, फ़राज़ ‘देहलवी’, मोहम्मद अब्दुल जब्बार खान ‘साथी’ (जयपुर) की ग़ज़लों के एक-एक शेर पर पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा|
कमर ‘बदरपुरी’ की इन भावपूर्ण पंक्तियों ने रंग जमा दिया –
“जब जब भी संजोग मिले,
कितने अच्छे लोग मिले”
वहीं तेजी से उभरते हुए युवा ग़ज़लकार अस्तित्व ‘अंकुर’ की इस ग़ज़ल ने भरपूर वाहवाही लूटी-
‘ज़िद पे आ जाऊँ तो खुद को भी डुबो देता हूँ
हौसला चाहिए दरिया में उतरने के लिए |”
हिन्दी साहित्यिक क्षेत्र में ग़ज़लों के प्रवेश के बारे में अनिल वर्मा ‘मीत’ का कहना था कि “इस लोकप्रिय विधा ने हिन्दी में आने के बाद एक लम्बा सफ़र तय किया है किन्तु ऐसा लगता है कि इसकी शास्त्रीयता कहीं कहीं प्रभावित हो रही है| दिल्ली पोयट्री सर्किल में आकर सुखद अनुभूति होती है कि यहाँ ग़ज़लों की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता है और उन पर चर्चा होती है|”
झज्जर (हरियाणा) से आए ‘वाह वाह क्या बात’ में अपनी हास्य कला की छटा बिखेर चुके मास्टर महेंद्र की कविता ने सभी को आनंदित कर दिया वहीं अशोक शर्मा, ध्रुव कुमार गुप्ता, शैफाली सुरभि, पंकज शर्मा, डॉ. सीमा गुप्ता ‘शारदा’, पी.के. शर्मा, सुखवर्ष कँवर ‘तन्हा’ दिनेश चन्द्र नागर, मदन लाल अहूजा, राजेन्द्र महाजन, राजीव “रियाज़” आदि कवियों ने प्रभावशाली ग़ज़लें, मुक्तक, गीत और कविताएँ सुनाईं|
गोपाल गंज (बिहार) से आईं वरिष्ठ ग़ज़लकारा डॉ. कुमारी नीलम की ग़ज़लों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया –
“तुम्हें मुबारक़ तुम्हारी फ़ितरत, हम अपने रब से यहीं कहेंगे
तुम्हारी कश्ती के रास्ते में, कहीं भी कोई भँवर न आए |”
समापन की और अग्रसर होते हुए गोष्ठी के अन्त में ताराचन्द "नादान" की ग़ज़ल भी खूब सराही गई –
“शज़र से टूट कर पत्ते का कोई दर नही होता
कटा जो अपनी मिट्टी से, फिर उसका घर नही होता”
गोष्ठी का समापन सभा के अध्यक्ष श्री अशोक लव द्वारा विभिन्न रचनाओं पर संक्षिप्त टिप्पणियों से हुआ| प्रेम बिहारी मिश्र ने कार्यक्रम का कुशल सञ्चालन किया तथा संस्था के अन्य पदाधिकारियों ताराचंद शर्मा, वीरेन्द्र कुमार मंसोत्रा और डॉ. चंद्रमणि ब्रह्मदत्त ने अहम भूमिका निभाई|


Dr Kumari Neelam

Dr Ashok Lav